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Sunday, August 9, 2015

सावन में माँ मनसा यात्रा की यादें

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

मेल-बिछोह परसपर दोनूं है जीवन का खेल। 
बड़ो मजो यात्रामें आतो ,जद जाता रेलमपेल।।
               तीन मील की विकट चढ़ाई , झरना को कळ -कळ कौल ।
               बीच राह में मिले जातरी ,जय माता दी बोल ।|
कोई लूण का मुठा लयातो कोई आटों और तेल
कोई पैसा को हिस्सों देतो ,कोई हो ज्यातो गेल ॥
               बरसां का मिलबा का वादा, यारी टीस जगाती।
               सावण को मतवालो मौसम, बाळपणै रा साथी ।
कुंडा की चादर में न्हाता ,उची छलांग लगाता
डाहढा की निझर को पाणी दाल चुरमो बणाता ।
                परबत का अंतस सु झरतो मिठो मधरो पाणी |
                मुसळ का लागी धमडका , नौपत बाज ज्याणी ॥
कुदरत का निजारां बी च,छक र लेता जीम ण
स्याणा,भोला सब मेल का ,और बिगड़ेड़ा तीवण ॥
             दुर्गम भयानक परवत बी च माता की सकलाई
             अंगुल सदृश मनसा माता ,मन म घणी है समाई ॥

Saturday, July 25, 2015

ककराना सुयश>

गजेन्द्र सिंह शेखावत 
डूंगर, टीबा ,नदी नाखळा 
गुणी , नळौ और,घाटी । 
खेड़ा , बाढ़ ,नाम खेतका,
कोई बंधो -कोई फांटी ॥ (1)

नर नाहर सदा निपजति
उर्वर महकती माटी
जगां -जगां बरगद की छाया,
खेत खेत म जांटी ॥(2)

पील पीमसयाँ ,अमरुद घणेरा
शहतूता और बेर
सांगरिया की लड़या निपजे ,
खीप खींपोळी केर ॥ (3)

डाब,दचाब , घास मोकळो
झेरण -भरूठ्यो , साठी
भरोट्यां लोग -लुगायां ल्याव ,
दिन उगी भाग फाटी ||(4)

कठे- पुराणो छपर झांक
कठे छान की टाटी
रेवड़ वाला सोवे निरभै ,
जुड़ कुवाडी झाठी ||(5)

भेड़ बकरियाँ ऊंट लरजता
देशी कुम्भी राठी
रोट बाजरा का सियाले
छठ -चौमासे बाटी ॥ (6

खिचड़ला का लागीं सबड़का
सक्कर घी की चांठी ।
मांगी मिलयाँ भी अमृत ला ग
छाछ गांव की खाटी ॥(7)

टाबर- टीकर स्कूलां जावे ,
ले हाथां बरता -पाटी |
शहर-परदेशा जावन हाला ,
चढ़ गाडी जा घाटी ॥(8)

प्रेम प्यार सूं रेवनहाला
ना झगड़ा ना लाठी ।
कितरो करा बखान इणरो,
आ मूँगा सूं मोती माटी ॥ (9)

Sunday, May 31, 2015

आरक्षण की दोगली नीति

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

आरक्षण की रेवड़ी,
कर दियो बंटाधार |
गरीब आज भी गरीब है ,
नेता को ब्योपार ।|
आजादी के क़ानून में
करदी तगड़ी रार |
एक बजावे झूंझणो,
दूजो खावे खार ॥
जाट पात न मेटन सारू
नेता घणा गा जै
कठे घोषणा कर अटल जी ,
कठे वसुंधरा रा जे
धर्म निरपेक्ष ,एक देश
अमीर- गरीब दो जाति
ऊँची जात को गरीब वंचित ,
चावे इमे पातीं ॥
टेम रेहतां इ लड़ाई न
नेतों थे अब मेटो ।
भेदभाव को यो दोगलो रासो ,
भींच नाख गो घेंटो ॥

Monday, May 25, 2015

राजस्थान की गर्मी का दूहा

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

ताती बाजे लूवां,
सुना -ढाणी  गांव |
तपती- बलती  बास्ते
 ज्यूँ सामो चूले- ताव ॥(1)

गर्मी की दोपहरयाँ,
कलडी तीखी धुप
मिनख जिनावर छापलरया ,
 कर्फ्यू को सो रूप ॥(2)

ध्यान राखज्यो बापजी र ,
कांदा  राब सूं हेत
दोपहरयाँ दरखतां तले,
 संज्या बाज्या खेत ॥ (3)

Friday, January 16, 2015

सरपंच चुनाव

गजेन्द्र सिंह शेखावत 
वर्षो का जो मेल जोल था
अब हो रहा मन मुटाव,
लगता है आ गया,
सरपंच का चुनाव ||
जो था एकदम सीधा -साधा
खाने लगा है अब भाव ,
लगता है आ गया,
सरपंच का चुनाव ||
जो न कभी बतियाता था
वो जोड़े हाथ पांव ,
लगता है आ गया,
सरपंच का चुनाव ||
ठन्डे पड़े चौपालों कि
अब है चर्चाओं में ताव,
लगता है आ गया,
सरपंच का चुनाव ||
सदा मौज में रहने वाले
बदले -बदले गांव
लगता है आ गया,
सरपंच का चुनाव ||
पक्ष विपक्ष दो पाले बन गए
राजनीती के दांव
लगता है आ गया,
सरपंच का चुनाव || 

Wednesday, December 31, 2014

थर्टी फर्स्ट

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

बड़ी होटलां में खाणा दाणा ,
गावै आळ बवाल |
थर्टी फर्स्ट को जश्न चालगो ,
ना च नो -नो ताल ||
चेत संवत्सर न भूल भायला,
अंग्रेजी साल मनाव |
देव देवता को छोड़ भोग,
शराब- कवाब गटकावे ||
अंग्रेज रांडका जाता -जाता,
करगा बंटा- ढार |
चंदण तिलक ने छोड़ भाई डा, ,
लिपटा वीं छी गार ||

Saturday, September 20, 2014

गांव के परम्परागत जल स्रोत >

गजेन्द्र सिंह शेखावत 
ककराना गांव के पुरातन समय से जल श्रोतों का आंकलन करें तो इस गांव की प्यास बुझाने के लिय कुछ ऐसे जल श्रोत थे जिनका दैनन्दिनी में महत्वपूर्ण स्थान था । वो रोजमर्रा के जीवन के हिस्सा थे । हमारे राजस्थान के उत्कृष्ट संगीत में भी पानी लाती पनिहारिन पर अनेक गीत व् पेंटिंग्स बनायीं गयी है व् जगह -जगह कथाओं में इनके रोचक प्रसंग है |  कुवे -बावडिया ,तालाब ,नदी  जल देवता के रूप में पूज्य थे । हमारे ग्रामीण जीवन में नवप्रसूताओं का कुआ पूजन का बहुत बड़ा विधान रहा है |वर्तमान में गिरते जल स्तर ने इन जल श्रोतों की प्रासंगिकता को  पूर्णरूप  से नकार दिया है ।

1. झरिया वाला कुआ - गांव के जल श्रोतो की महत्वपूर्णता के लिहाज से यह कुवा सर्वोच्च स्थान रखता था ।बताते  है पहाड़ी स्तिथ एक खदान का भूमिगत सम्पर्क इस कुवे से था ।कुवे की अंदरुनी सतह   से चारों तरफ पत्थरों की दरारों से झर-झर कर पानी का रिसाव  कुवे में होता था ,शायद इसलिय इस कुवे का नाम "झरिया वाला कुवा" पड़ा । इस कुवे का अपेक्षाकृत सबसे मीठा पानी था ।मारवाड़ व् वागड़ प्रदेश से आने वाले अतिथि इस पानी को पीकर मुरीद हो जाते थे| गांव के घर परिण्डो   के मटकों में झरिया कुवे का पानी मुख्य  स्थान रखता था ।  कुवे के अंतर्गत सिंचित भूमि (जाव) थी|  जिसे इस  कुवे से सिचाई की जाती थी ।   धीरे धीरे गांव के विस्तार के साथ साथ सिर्फ पिने के पानी के रूप में इसका उपयोग होने लगा ।
2. जोड़ा (जोहड़)- गांव के दक्षिण दिशा की दो पहाड़ियों का बरसाती पानी इसमें इकठ्ठा होता था । बरसाती दिनों में प्रयाप्त जल राशि  इसमें संचित हो जाती थी । जहा पर पशुओं के पिने व् नहाने  का पानी रहता था । जोहड़ के पानी के संग्रहण से आस पास के जलाशयों मे  पानी का स्तर बना रहता था । इस जोहड़ की आज भी प्रासंगिकता है परन्तु वर्त्तमान में आस पास के क्षेत्र में बने  अतिकर्मण ने इस और आने वाली पानी की धाराओं को अवरुद्ध कर दिया है ।
3. कुवाली का कुआ - यह कुआ भी सिंचाई के लिय प्रयुक्त होता था । वर्तमान स्कूलों का मैदान तब सिंचित भूमि होती  थी । लाव -चरस से बेलों की जोड़ी पानी को खींचती थी । एक  व्यक्ति कुवे के जगत पर खड़ा चड़स को पकड़ता तो दूसरा बेलो को हांकता था । चड़स पकड़ने वाला एक गीत के माध्यम से चड़स को ढाणे तक पहुचने का इशारा करता था ।   पानी से लबालब चड़स जब मुहाने तक आ जाती   जब  कुवे के मुहाने पर बने ढाणे में गिराया जाता था । बाद में जब ८४-८५ में जलदाय विभाग का टैंक बना तब इस कुवे को भी वाटर सप्लाई से जोड़ा गया ।
4. बाबाजी की कुई - यह कुई गोपालजी के मंदिर के पीछे की तरफ बनी हुयी थी| इसका प्रयोग  मंदिर के निचे छोड़ी गयी भूमि की सिंचाई के लिय  किया जाता था । हमेशा से ही मंदिर में महंत  के रहने से बाबाजी की कुई के नाम से पहचानी  जाती थी । इस कुई का जलस्तर कुई के मुहाने तक बना रहता था । ८० के दशक के  बाद तक इस कुई  में पानी का अच्छा आवागमन था ।
५ बजारवाला कुआ - यह कुआ वर्तमान शिवजी के मंदिर पास भग्नावस्था में मौजूद है । इस कुवे से भी गांव का एक हिस्सा पानी की आपूर्ति करता था |
6. कुम्हारों के चौक का कुआ - यह कुआ भी काफी प्राचीन है । निचे फैले गांव की मध्य पट्टी पानी का उपार्जन करती थी | तत्कालीन निचे आस पास की भूमि  की सिंचाई इस कुवे से भी होती थी ।
7. हरिजन मोहल्ला कुआ - यह कुआ भी काफी पुराना है । कुए के चारों और पक्का जगत व् भूण (गोल काठ का पहिया)  के चार स्तम्भ खड़े हुए है ।
 उपरोक्त सभी कुवे अपने आरम्भिक दिनों में सिचाई के लिय बनाये गए थे । उस समय गांव का मानचित्र कैसा होगा ? आज स्वचालित पंप का पानी नलो के  माध्यम से घर के पात्रो तक पहुंच गया है । परंपरागत जल श्रोत रिक्त हो चुके है ।जल श्रोतों से सम्बंधित कुछ शब्द व् वस्तुए तो जैसे बदलते समय के साथ विलुप्त सी हो गयी | पनिहारी के सिर पर शोभित होने वाला मुकुट ईंदानी अब बीते जमाने की बात बन कर रह गई है,दोगड़(दो घड़े सामानांतर रू प से ), बिलाई ( कुवे में गिरे पात्र को रस्सी के माधयम से बांधकर निकलने का औजार ),चड़स,बरी आदि ।  इनकी रिक्तत्ता ने पानी के साथ साथ  जल के रूप में  पूजी जाने वाली उन मान्यताओं व्  पणीहारिनो को महज कल्पित  चित्रों तक सिमित कर दिया है |  जिसे आज का तरुण केवल पेंटिंग्स देख कर निहार सकता है ।

Friday, August 8, 2014

श्री १००८ बाबा सुन्दरदास जी महाराज का मेला

गजेन्द्र सिंह शेखावत 
शेखावाटी के विस्तृत भूभाग पर अनेक महापुरुषों ,लोकदेवताओं ,शहीदों के मेले लगते रहे है । इन मेलों में ग्राम्य जीवन की मिठास छिपी होती थी। श्रद्धा के सैलाब में मेल जोल व् दैनिक जीवन की वस्तुओं की खरीद तो होती ही थी । इसके अलावा लोकानुरंजन के भी यही माध्यम होते थे
बबाई खेतड़ी मार्ग पर पर्वत की सुरम्य उप्यातिकाओं की तलहटी में बसा एक छोटा सा गांव है "गाडराटा" | इस गांव की मुख्य पहचान अंचल के सिद्ध बाबा श्री सुंदरा दास जी महाराज के तपोभूमि बनाये जाने से है । सुन्दर दास की खेतड़ी ,उदयपुरवाटी ,नारनौल ,नीमका थाना के सुदूर गांवों में गहरी श्रद्धा व् मान्यता है । बाबा सर्पदंश निवारक देव के रूप में जनमानस में पूज्य है । शेखावाटी के प्रमुख मेलों में से एक भादवा सुदी तेरस को बाबा सुन्दरदास का लख्खी मेला लगता है ।

मेले के दौरान इस अंचल के सभी मार्ग बाबा सुन्दरदास महाराज की जय से गुंजयमान रहते है । बाबा के भोग की मीठी कढ़ाई गठरी में दबाये नर नारी, बच्चे मेले की उत्सुकता में प्रायकर हर उस और जाने वाले मार्ग पर द्रस्टिगोचर हो जायेंगे ।पुराने समय में तो गाँवो के झुण्ड के झुण्ड पद यात्री मेले के प्रस्थान के लिय भोर में ही शॉर्टकट नाका डूंगर के मार्ग से निकलते थे ।

वर्तमान परिद्रस्य की अपेक्षा उस समय मेले ,त्योंहारों का ग्रामीण जन जीवन में उत्साह भागीदारी व् मेलमिलाप व्यापक था ।मुख्यरूप से बड़े झूलों,मौत का कुवा व् जादूगरी करतब आदि का आनंद इसी मेले में आता था ।
मेले में हर गांव का एक नियत स्थान होता जहा इधर -उधर होने व् साथ छूट जाने पर पर इन्तजार किया जाता था । खेतड़ी ,नीमकाथाना की तरफ के महिलामंडल का अपने पीहर पक्ष के लोगों से मेलजोल इसी मेले में होता था । नयी रिश्तेदारियां बनायीं जाती । शादी योग्य युवक युवतियों के संबंो के बारे में चर्चाये होती व् एक दूसरे को देखे -दिखाए दिखाए जाते थे । महिलाये बेटी सगीयों को "मिळणे" देती थी । व्"सीठने व् गालें" गायी जाती थी | नव कप्पलस मेले में साज सिंगार की वस्तुए खरीदकर देते । मेले में खरीददारी करने के उपरांत सिनेमा प्रेमी युवक खेतड़ी -कॉपर के सिनेमा हाल की तरफ रुख कर लेते थे ।
बाबा सुन्दरदास जी के मंडप तक पहुचना व् दर्शन करना अत्यंत दुर्लभ कार्य था । जात्रियों की लम्बी कतारें धकमपेल को देखकर देर से पहुंचे जातरी दूर से ही भोग कढ़ाई अर्पित कर देते थे ।मध्यरात्रि के बाद तक खचाखच भरी बसों में लोगों का घरों की और पलायन जारी रहता था । समय के साथ साथ मेले की रंगत फीकी जरूर हुयी है लेकिन बाबा के भोग सामग्री -प्रसाद आदि लोग अब भी पहुचाते है ।
बचपन के सुखद संस्मरण में बाबा सुन्दरदास भी हमेशा सुखद स्मृति के रूप में अमिट रहेंगे

Saturday, July 5, 2014

जलमभोम (जन्मभूमि)

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

डूंगर का आडा में ,उतरादो देव धनि है ठाडो|
गाय -धर्म को रक्षक , माता सेढू को यो लाडो 
चावलां को प्रसाद चढ़े,और ऊपर शकर को दाणों| 
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों ॥

गाँव सामो उंचवे लिछमन धनि बिराजे 
उदेपरवाटी  म एकला, ठाकर को डंको बाजे 
हाथ गदा हड्मान,और लिछमन के शाही बाणों
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों॥

नाला में गोपालजी गऊआ ने चरावे 
सुंदर मंदर बन्यो जख में बांसुरीया बजावे |
शिव परिवार भी साथ में ,सरपां को है गेहणो 
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों ||

सर्प दोष ने दूर करे अठे बाबो हिरामल 
सांप कट्या को जहर उगले ,देव है बड़ो परबल 
पाँच की व्ह्ह धुप ध्यावना ,आवे जातरी भारी 
चढ़ा प्रसाद पताशा नारेल ,तांती बांध न्यारी |
गोठिया बाबा का गावे ,खिंच कान को त़ाणों 
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों ॥

सति  -जती, महात्मा निप्ज्या ई धरती क माय 
चतर कँवर ,हरिदास जी,  
दादाजी न ध्याय 
भेरुं ,माता शीतला, पितराँ का बण्या है थान 
धो ख मावस न देकर ,राखा बाको मान | 
सति जी की म्हमा न्यारी, मंदर बहुत पुराणो
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों ॥

मिडिल बालिका ,सिनियर,शिक्षा न्यारी न्यारी 
मिनख अठा का सीधा -सांचा ,और है ब्योहारी
दिखनादा की डूंगरी पर माता मंदर प्यारो 
घाटी में मतवालों भेरो बैठ्यो सबसू न्यारो 
नदी किना र देबी मंदर कुदरत को नजराणो |

धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों

अंग्रेज फौज म सूबेदार पद पायो पाबुदान
पेंतालिस गांव की पंचायत म मानेता बड़ मान !
कुरीतियां क बिरुध् उन बख्त बिगुल बजायो
कन्या हत्या,अशिक्षा को जद झंडो चढ्यो सवायो !
जैपर स्टेट म नांव-गांव को लिख्यो उज्ज्वल परवाणो
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों !!


खेतरपाल रिगतमल भैरूं, मामलिय म्हामाई 
गुडगांवा अर ,तांतिज की जात लागती-आई।
रात च्यानणी और अंधेरी, देव पितर में बांटी
भोग भ र मायाँ को भागण, चावल दाल काठी |
जात-जडूला धोक-चूरमा, पितरां को जगराणो
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों ॥


ढाणी -ढहर न्यारा -न्यारा, पण परस्पर मेल
मजदूरी खेती पर निर्भर कोई रेवड़ क गेल |
बोलै कम सोचै परहित में, सेखी नही बधारै। 
आडी में आडा आवणिया, सैं का काम संवारै |
बिन बिरखा और ताल तलैया, पाणी घणो अब उंडों
प्यासी रोही अपलक उडीक, चौमासा को मुंडो |
बीती बात हुय्या पनघट, अ र पाळ, नदी को न्हाणो
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणो ||


घुघाव मोड्यां रुंद गला सु, छतरी ताणै मोर 
गुट्टर-गूं कर चुगै कबूतर, बिखरै दाणा भोर |
भेंस बकरिया गाय मवेशी दिन उग्तानी दुव 
फोई खातर टाबर-टोली काड हथेली जोवै |
झरमर -झरमर घर धिरयाणी घा ल दही बिलाणो
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणो ||


सब जातां को मेल अठे ,शांति को है बासो 
कोई प्राइवेट रुजगार करे ,कोई को राज म पासो 
रल मिल मनावे तीज त्योंगर, और गाँव का मेला 
गणगोरयाँ को होवे उछब,भान्त -भान्त का खे ला 
कोई शहर को बासी होगो ,और कोई देश बीराणों ।
धन - धन है या जलमभोम ,नाम है ककराणों

Thursday, February 6, 2014

ककराना के रईस सेठ दुलीचंद ककरानिया

गजेन्द्र सिंह शेखावत 
शेखावाटी की पावन धरा अनेक रणबांकुरो ,धनकुबेरो ,त्यागी -तपस्वी,महापुरुषों की क्रीडा स्थली रही है ।इस मिटटी के कण -कण में दस्ताने छुपी हुयी है ।जो की अधिकांशतःजनमानस की स्म्रति से विस्म्रत हो चुकी है ।
ककराना गाँव एक संतुलित जातिगत समीकरण वाला गाँव रहा है । पुराने समय में गाँव के काफी सेठ परिवारों का पलायन व्यापार के संदर्भ में हो चूका है । ककराना से निकले बहुत से सेठ परिवारों ने अपना टाईटल गोत्र के स्थान पर "ककरानिया"लगा लिया ।जिन्मे बहुत से परिवार आज भी चिड़ावा में निवास करते है | इसी धरा पर ही जन्मे एक सेठ थे दुलीचंद ककरानिया ।दुलीचंद अपने ज़माने के रईस सेठों की गिनती में आते थे ।ककराना की तंग गलियों से निकलकर इन्होने कलकत्ता महानगर में अपना व्यवसाय स्थापित किया ।उनका रिहायस घर उस समय की कलकत्ता की प्रमुख सुंदर कोठियो में एक थी ।कोठी के सामने सुंदर बगीचा उनके रहिसपन की बानगी ही थी ।सेठजी का मिटटी से लगाव इतना था की अपने नाम के आगे गाँव का टाइटल लगाकर ककरानिया के नाम से जाने गए ।सुनने में आता है की एक बार ग्रामीण प्रवास पर उन्होंने गाँव की सुनियोजित बसावट करने की मनसा प्रकट की ।उनकी इच्छा थी की गाँव के मुख्य रास्ते पक्के ,स्ट्रीट लाइट व् गाँव का व्यवस्थित चोपड़ बाजार हो । परन्तु तत्कालीन युवा लोगो ने अपने गाँव के वर्तमान स्वरुप को ही प्रिय बताकर इसके प्रति अनिच्छा प्रकट की ।सेठ जी इत्र- कुलीन के बहुत शोकिन थे । जनश्रुति के अनुसार उन्होंने इंदिरा गांधी को अपने निवास पर नोटों कि गड़िया जलाकर चाय बनाकर पिलाई थी । इस बात में कितनी सचाई है ,कहा नहीं जा सकता |
वर्त्तमान में भी उनका वंश परिवार अपना सरनेम ककरानिया लगाता है । उनके व्यापर के उत्पादों का चिन्ह ककरानिया नाम से है | हालाँकि उनमें से कोई गाँव में कभी आया नहीं है लेकिन उन्हें इतना पता है की उनके पुरखों की जन्म स्थली ककराना नामक गाँव रहा है ।
वर्त्तमान में भी बहुत से लोग बड़े स्तर पर व्यापारिक गतिविधियों में शुमार है परन्तु समाजभाव नगण्य सा है । आज के व्यापारी ने अपने वित्त का बड़ा हिस्सा स्व आमोद प्रमोद पर खर्च करने का शगल बना लिया , जिससे समाज भावना विलुप्त होने कि कगार पर है |

Tuesday, November 12, 2013

गीत- गाओ टाबरों

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

गीत- गाओ टाबरों,
थारा मुलकबा सूं देश हरखसि 
थे ही तो हो आगला टेशण 
जमाना रे साथै करो खूब फैशन 
पण याद राखो बुजुर्गा री बातां 
बे मुस्किल घडी री रातां 
जोबन रो मद भी चढ़सी 
कुटुंब कबीलो भी बड़सी 
प्रणय की भूलभुलइया में 
प्रियतमा की आकृष्ट सय्या में 
भूल मत जाज्यो ज्ञान की सीख 
मत छोड़ज्यो पुरखां का पगां री लीक 
थे ही घर, गांव,परिवार ,रास्त्र री अनमोल थाती हो 
जीवन रूपी दीया री,  बिन जळी बाती हो|
Read more-
http://www.aapanorajasthan.org/index.php

http://www.gyandarpan.com/2013/11/blog-post.html

Saturday, October 26, 2013

चुनावी समर

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

बज उठी दुन्दुभिया,हो गया एलान लोकशाही समर का
धूर्त शकुनियो ने कस  लिया कमरबंध अपनी कमर का ।

सावधान  । निर्लज्ज आयेगा बस्ती में भिखारी बनकर ।
निसंकोच करेगा आलाप , वह मंच पर तनकर |

 जादूगरी दिखायेगा शब्दों की गलियों नुक्कड़ कुचों पर
भीड़ में इन्सान नहीं वोट गिने जायेंगे और नजर होगी मतदान बूथों पर |

भावनायो ,सूरा के पैमानों से बहकाएंगे,तीर तरकश में होंगे अनेक
क्षेत्र ,ढाणी,गाँव ,जाति,धर्म  के अनुपात को देखकर देंगे उन्हें फेंक |

कौन पूछे गा उनसे की विकाश का मुह किधर है?
भूखा नंगा भारत फुटपाथ पर देखो इधर है  |

पूंजीपति-भ्रष्ट ,मुनाफाखोर,कालाबाजारियों की बनाते तुम कोठिया
सर्वहारा वर्ग के पेट से दूर मत करो  दो जून की रोटिया  ||

Friday, August 30, 2013

भारत निर्माण करे

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

देश  की अर्थव्यवस्था का क्यों ना चीर- हरण करे
आओ इसी तरह भारत निर्माण करे ।

देश जाए भाड़ में , कोई जिए -कोई मरे
हम सिर्फ अपना पेट भरें
 आओ इसी तरह भारत निर्माण करे ।|

भारत के मुखोटे को ओढ़े विदेशी राज करे
है कैसी यह विडंबना समझ से परे
आओ इसी तरह भारत निर्माण करे |

Tuesday, August 6, 2013

नाका का डुंगर" -और उससे जुडा ग्रामीण जीवन

गजेन्द्र सिंह शेखावत

ककराना गाँव को क्षेत्रफल की द्रस्ती से देखे तो मिश्रित रूप द्रस्टीगोचर होता है । गाँव के अंतर्गत लगभग १५००० बीघा का रकबा है| जिसमे से ९००० बीघा भूमि पर पहाड़,टीले व् बारुनी है| शेष ६००० बीघा सिंचित भूमि है | गाँव के पूर्व दिशा में अरावली पर्वत की पहाडियों की लम्बी श्रंखला है । इस काले पर्वत को लोग "नाका वाला डुंगर"के नाम से पुकारते रहे है ।इस पर्वत श्रंखला के आस पास भेड़ ,बकरी ,मवेशी पालको को बारह मास चारा,पेड़ों की पत्तिया आदि उपलब्द होती है । नाका वाला डुंगर की गुर्जर समाज की आजीविका में मुख्या भूमिका रही है | इनके पशुओ के "रेवड़"इस पर्वत के आगोश में अपनी उदरपूर्ति करते है |

लगभग २५ वर्ष पहले तक जब यह पर्वत जंगलात(वन) विभाग के नियंत्रण में नहीं था तब अधिकांशतः गाँव वासी इस पर्वत की लकडियो का उपयोग जलाने के रूप में करते थे ।सुबह भोर में युवकों की टोली अपने खान -पान का सामान व् पानी आदि लेकर नाका के इस पहाड़ की और कुच कर जाते थे ।नाका के इस पहाड़ की एक विशेष जगह है "साधू की गोडी "।इस स्थान पर बारहों मास स्रावित एक छोटा सा जल- श्रोत है ।इससे निकला जल रिस कर पत्थर की कुण्डी में इकठा होता रहता है । बताते है किसी समय में यहाँ एक सिद्ध महात्मा ने तपस्या की थी ।उसि के परिणाम स्वरुप इस पवित्र स्थान पर पानी का यह श्रोत बना था ।गर्मी की तपती दोपहरियों में गडरियो का अपनी प्यास बुझाने का एकमात्र श्रोत यही है । जलविहीन इस पर्वत पर इस श्रोत में से पानी का अल्प रिसाव आश्चर्यजनक व् श्रधा का केंद्र है |

भादो के महीने में अंचल के प्रसिद्ध सुंदरदास बाबा के जाने वाले पैदल मेलार्थियों का इस पहाड़ से जाने का ही शोर्ट कट रास्ता हुआ करता था | जो अलसुबह भोर में जयकारो के साथ कूच करते थे ।

आम दिनों में लोग यहाँ से लकडियो को बीनते ,और उनके सुगठित गठर बनाते थे ।पर्वत का मुख्य फल "डांसरिया" चुनते और सामूहिक मस्ती से लगभग २-३ किमी की दुरूह यात्रा को पार करते थे ।दोपहर होते-होते गाँव की सीमाओं में लकड़ियों के बण्डल सर पर रखे थके -मांदे महिला और पुरुषों का झुण्ड छोटे- छोटे टुकडो में आगे पीछे प्रवेश करता था।समय कितना तेजी से बदलता है , आज के इस सिलेंडर दौर के युवा क्या जाने तब चूल्हा कैसे जलता था ।

Sunday, July 28, 2013

सावण आयो री सखी, मन रौ नाचै मोर

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

सावण आयो री सखी, मन रौ नाचै मोर ।
जल बरसाव बादळी, अगहन लगी चहूं और ।।

झड़ लागी सावण की ,टिप -टिप बरसै मेह
यौवन पाणी भिजतां, तापे सगळी देह ।।

झिर -मिर मेवो बरसता, बिजली कड़का खाय ।
साजन का सन्देश बिना, छाती धड़का खाय ।।


काली -पीली बादळी, छाई घटा घनघोर ।
घर -जल्दी सूं चाल री, बरसगो बरजोर ।।

गगन मंडल सूं उतरी, तीजा चारुं मेर।
रेशम -रेशम हुयी धरा, खिलगा जांटी - केर ।।

सावन का झुला पड्या, गीतड़ला को शोर ।
नाडी-सरवर लौट रहया, टाबर ढांढ़ा - ढोर ।।

चित उचटावे बीजळी, पपिहो बैरी दिन -रैण।
"पिहू-पिहू" बोले मसखरो, मनड़ो करे बैचैण ।।

गुलगला को भोग ल्यो, गोगा करो मैहर।
पाछ सगळा जिमस्यां, थान्को धुप्यो खैर ।।
तीज - सिंझारा,रखपुन्यूं, घेवर रौ घण चाव ।
हिंडा - हिंडू बाग़ में, सजधज करूँ बणाव ।।


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सावन में पूर्णरूप से श्रंगारित उदयपुरवाटी की वादियाँ

चित्र में जलराशी से लबालब कोट बांध
सावन का पवित्र महिना चल रहा है इस समय में उदयपुरवाटी की रूखी सुखी लगने वाली ये पहाड़िया हरीतिमा की चुनर ओढ़े पूर्णरूप से श्रंगारित है ।सावन भादवे के महीने में ये वादियाँ मन को मोह लेती है व् यहाँ बने तीर्थ अपनी और भक्तो को आकृष्ठ करते है ।इस समय में माँ मनसा पीठ ,लोहार्गल,शाकम्भरी माता ,किरोड़ी धाम ,कोट बांध आदि के जलाशय चटानो के सीनों से रिसकर आने वाले शीतल जल से परिपूरित है ।इस सोमवार से शिव भक्त कावडों में पवित्र जल भरकर भोलेनाथ का अभिषेक करेंगे तो कुछ सैर सपाटे के लिए यहाँ की वादियों को निहारने के लिए जाते है ।
भक्तिमय वातावरण से ओतप्रोत इन तीर्थो की सुरम्य उप्यतिकाए सैलानियों की पसंदीदा व् रूह को शुकून देने वाले स्थान रहे है ।

Thursday, July 25, 2013

नीम का पेड़

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

घर के सामने खड़ा वो नीम का पेड़ ।
उसने दी छाया ,और बचाया सूर्य की प्रचंड किरणों से
वह साक्षी रहा हर अछे -बुरे समय का
घर के -आंगन में फेकता था पकी -निमोलियाँ ।
शायद यही उसका ख़ुशी व्यक्त करने का था तरीका ।
तोते -गोरयां ,मोर ,चिडियों की चहचाहट शाम -सुबह को होती ।
उनकी घर आने की ख़ुशी को अपने आंचल में डांप लेता था वह ।
सचमुच कितना दरियादिल था
कभी कुछ नहीं चाहा,जो बना देता रहा ।
यहाँ तक की जाते -...जाते भी अपना मूल्य दे गया था ।

अब उस जगह पर है सूरज की किरणों का डेरा
न पक्षियों का गुंजन ,बस रह गया एक अनजाना सा खालीपन>>>

Thursday, July 11, 2013

सूबेदार ठाकुर पाबुदान सिंह शेखावत का महल.

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

अंग्रेजी हुकूमत के समय सेना में सूबेदार रहे ठाकुर पाबुदान सिंह शेखावत के द्वारा अपने रनिवास के लिए बनवाया हुआ खुबसूरत महल.

यह महल निश्चित ही उस समय में ककराना का सबसे सुंदर भवन रहा था ।बताते है इसके निर्माण के समय में पत्थर के खम्बे,कंगूरे ,आदि को ऊँटों पे लाद कर लाया गया था ।व् ऊपर चढ़ाया गया था ।इसकी चमकदार,मखमली पुताई में प्रुयुक्त चुना -पत्थर को लोडी-सिलावट के ऊपर बहुसंख्य मजदूरो के द्वारा घिसाई करके चिकना बनाया गया था ।महल पर लगे कंगूरे व् रंगीन कांच के रोशनदान दूर से ही महल के आकर्षण को बया करते थे ।ठाकुर पाबुदान सिंह पेंतालिषा के प्रमुख व्यक्तियों में गिने जाते थे ।वे  राजपूत समाज की कुरीतियों के खिलाफ  थे ।उन्होंने उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया ।वे परम गो -भक्त थे |

स्वामी विवेकानंद जी और खेतड़ी दरबार अजीत सिंह जी में प्रगाढ़  मित्र थी । स्वामी जी कहा करते थे "हम दोनों एक साथ इस धरा एक दुसरे के पूरवज के रूप में अवतरित हुए है ,इस प्रकार कुछ भी मांगने व् लेने में मुझे कोए संकोच नहीं होता । एक और एक धर्म रक्षक राजा तो दूसरी और एक धर्म रक्षक सन्यासी ।

सूबेदार पाबुदान सिंह की खेतड़ी दरबार से मित्रता रही । अपने रनिवास के लिए बनवाया गया महल में बताते है उनका सहयोग रहा था | गाँव की जोशियो की जोड़ी भी खेतड़ी की ही देन  है । समय के अनुसार गणना  करने से ही निश्चित कर सकते है की वो अजीत सिंह जी का समय था अथवा उनका पूर्ववर्ती काल ।

उन्होंने तत्कालीन समय में समाज में कन्या -भूर्ण जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद की । अंग्रेजी हुकूमत में भारतीयों का बड़े पद तक पहुचना असंभव था ।परन्तु वह अपनी काबिलियत से सूबेदार के पद तक पहुचे  उन्होंने जीवन में दो विवाह किये । परन्तु कोई संतान नहीं हुयी ।महल में राजदरबार से भेंट स्वरुप प्राप्त हुयी अपार धन सम्पदा ,बहुमूल्य चित्र आदि उनके स्वर्गवास के पश्चात बहुत से हिस्सों में बंट गए । आज समय के साथ साथ उस महामानव का कृतित्व तो धूमिल हो गया लेकिन यह महल आज भी  नाम को यदा -कदा  स्मरण करवा देता है |


Monday, July 8, 2013

पित रंग की चुनर ओढ़े...


 

गजेन्द्र सिंह शेखावत

पित रंग की चुनर ओढ़े, खेत मेरे लहराए
फागुन की मद-मस्त बहार, हुक सी जगाये ||
कुदरत भी रंग बरसाए ,अपने कैनवास से
वृद्ध भी जवां हुआ, मस्त फागुन मास में ।|


कोयल -पपीहा गाए गीत, मधुर मधुमास में
बिरहा का अंतर भी तडफे, पिया मिलन की आस में ।|

चंग-मंजीरे की थापे, गूंजे आधी रात में
देख निहारे गोरी चढ़कर, घर की ड्योढ़ी - छात में ।|


यौवन फिर से दस्तक देता, बूढी जर्जर काया में
मद मस्त हो झूम उठा मन ,गीत प्रेम के गाया में ।|

बच्चों की टोली खेले धोरों पर ,उज्जवल धवल रात में
सब मिलजुलकर एक हो यहाँ ,भूले जात-पांत ने।|


फागुन की सतरंगी सीख, जीवन है जोश ,आशा का
प्रकृति के सौम्य रूप को जानो ,मान करो मूक भाषा का ।|


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Thursday, July 4, 2013

सकड़ व् सांचे देवीय अवतार - श्री १००८ सतीबाजी महाराज-

गजेन्द्र सिंह शेखावत 

घोडा माथे बीराजता, सिद्द करता सब काज ।
पिरथम थारो सुमरण करू,सती -बाजी महाराज ।।

गर्भगृह में ज्योत प्रज्वलन  
ककराना ग्राम के दक्षिण दिशा में दीपपुरा मार्ग पर एक ऊँचे टीले के निचे ढलान भाग पर श्री सती -बाजी महाराज का मंदिर अवस्थित है ।इनके अवतरण के बारे में सुना जाता है वह लगभग २५० वर्ष पूर्व का वह समय रहा होगा । इनके पति का नाम दूल सिंह शेखावत था व् इनका नाम चत्तर कँवर था। विवाह के कुछ समय पश्चात चतर कँवर के पति दूल सिंह का अल्पायु में आकस्मिक निधन हो गया था । पति के अकश्मिक निधन के पश्चात इनमे देवत्व-तेज जाग उठा था।और संसारिक जीवन की क्षण -भंगुरता व् जीवन से निर्लिप्त होकर इनमे सतीत्व का भाव बना था ।
उस काल में अनेकों गाँव-ठिकानो में कुलीन राजपूत स्त्रियों में ईश्वरीय उपासना की प्रगाढ़ता व् परस्पर वैवाहिक संबंधों की मजबूती से पति के स्वर्गवास के पश्चात सती-जती होने के अनेकों उदाहरण इतिहास के सुनहरे पन्नो पर दर्ज है ।राजस्थान के अनेकानेक गाँव -ढाणियों में झुंझार -सती के मंदिर -देवरे इनके प्रमाणों को पुष्ठता प्रदान करते है ।
सती जी का जन्म चुरू जिले के एक गाँव में जन्म हुआ था। यह बिदावत -राठोड राजपूतों की पुत्री थे ।
बाजी ने सती होने से पूर्व बताया की केड गाँव के एक ठाकुर की गर्भवती घोड़ी है ।उस घोड़ी के गर्भ में जिव अंश के रूप में मेरे पति का जीवांश अवस्थित होगा। जिसका ठीक आज से सातवे दिन गर्भपात होगा ।और यहाँ रखी हुयी नीम की दातुन दो भागों में स्वतःही विभक्त हो जाएँगी । तब मेरा विधिवत देवरा धोरे के ऊपर बना कर मेरी मान्यता स्वीकार करना।
बताते है उनके सती होने के बाद सातवें दिन केड ठाकुर की घोड़ी का गर्भपात हुआ ।व् इधर सती वाले स्थान पर रखे हुए दातुन दो फाड़ो में विभक्त हो गए थे ।पीहर पक्ष की आंचलिक भाषा के अनुसार इन्होने अपने देवरे के उपलक्ष में कहा "म्हारो मंदिर धोरा माथे बणावज्यो "।मारवाड़ -बागड़ प्रदेश की तरफ "धोरा" टीले को बोला जाता है जब की शेखावाटी क्षेत्र में कुवे के पानी को क्यारियों में छोड़ने के लिए मिटटी की मेड से बनी हुई छोटी नहर को "धोरा "कहते है ।और उसी समझ के अनुसार पानी के धोरे पर बनवा दिया गया था।जो की बाजी की इच्छा के अनुसार नहीं था ।जिसके फलस्वरूप कुछ समय में ही मंदिर में दरारें आ गयी व् पुराना प्रतीत होने लग गया था । मंदिर का द्वार उत्तरमुखी है व् सामने विशाल सघन वटवृक्ष है ।वही सामने ही जानकी दादी के द्वारा बनवाया हुआ विश्राम गृह है । बाजी के मंदिर के आस पास रियासतकाल में ओरण(भूमि) छोड़ा गया था । मंदिर के आस पास का भूभाग सती वाली ढाणी के नाम से जाना जाता रहा है । सती वाली ढाणी में सैनी परिवार निवास करते है । 
सती -बाजी की मान्यता व् महिमा को शब्दों में पिरोना संभव नहीं है । राजपूत समाज के अलावा अन्य समाजों में भी इनकी मान्यता है । सच्चे मन से स्मरण करने से मनोवांछित कार्य पूर्ण होते है। मंदिर में बाजी की नयनाभिराम मूरत को देखते ही एक अलोकिक दिव्य शक्ति का आभास होता है ।राजपूत परिवारों में किसी भी मंगल कार्य के प्रारंभ से पहले सती जी की महिमा में मधुर गीत महिलाएं कुछ इस प्रकार से गाती है
या माता ककराणा की सकड़ साँची है
या माता बिदावत जी सकड़ साँची है ।।
वही सती जी के श्रृंगार की महिमा में कुछ इस प्रकार से अर्चन करती है
"माता जी न चुडलो सोहे ,जगदम्बा न चुडलो सोहे
चुडल री शोभा न्यारी सा ,थान सींवरा राज भवानी"
सती- बाजी ने सती होने से पूर्व राजपूत समाज में कुछ आण दी थी।उनकी इन वर्जनाओं का आज भी सिद्दत से पालन किया जाता है ।
१.आपके व् वंशजों के द्वारा कभी भी घर -परिवार में "छींके"का प्रयोग नहीं किया जावे ,(पहले लोग अपने कच्चे घरों में खाने-पिने की वस्तुओं को मिटटी के बर्तनों में डालकर खींप के छींके में लटकाकर रखते थे ।)
२.राजपूत महिलाएं बैठने में पीढ़े का इस्तमाल कभी भी नहीं करें ।जैसा की आज भी महिलाये भूमि पर दरी -जाजम बिछाकर कर बैठती है ।
३.महिलाये कभी भी काले पल्लू की ओढ़नी नहीं ओढ़े ।

पुराने समय में सती बाजी के प्रसाद के रूप में मीठा "दलिया" का भोग लगाया जाता था ।प्रतेक शुक्ल पक्ष की द्वादशी (बारस) को राजपूत परिवारों के बड़े-बच्चे धोक के लिए जाते थे।विगत लम्बे समय से जिर्नोदार नहीं होने से मंदिर काफी जीर्ण अवस्था में हो गया था ।अभी 2008 में मंदिर का जीर्णोद्वार श्री महावीर सिंह शेखावत ने करवाया है ।ढाणी में रहने वाले सैनी परिवार सती- बाजी की सुबह शाम मंगल पूजा व् दीपदान मनोयोग से करते है ।राजपूत समाज में विवाहोपरांत नवविवाहित जोड़ों की धोक लगाने सतीजी के अनिवार्य रूप से आते है ।प्रतेक माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी (बारस) को सती -बाजी की ज्योत जलाई जाती है व् प्रसाद चढ़ाया जाता है। दीपावली के पावन त्योंहार पर भी घरों में दीप प्रज्वलन से पूर्व सती -बाजी के दीपक व् ज्योत सामूहिक रूप से जलाई जाती है ।
चरण कमल में बंदना,माथे राखज्यो हाथ ।
शरण पड्या ने अपनायज्यो ,करज्यो माँ कर्तार्थ।।



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